कुवार्याल भीमाल पेन का संपूर्ण इतिहास: गोंडवाना के महानायक और जल-रक्षण पेन
गोंडवाना की पावन धरा और कोइतूर संस्कृति में कुवार्याल भीमाल पेन का इतिहास अत्यंत गौरवशाली है। वे न केवल एक ऐतिहासिक महापुरुष थे, बल्कि अपनी सिद्धियों और शक्ति के कारण आज गोंड समुदाय के आराध्य देव हैं। आइए, वीडियो में दी गई जानकारी के अनुसार उनके जीवन के हर पहलू को विस्तार से जानते हैं।
1. जन्म और पारिवारिक पृष्ठभूमि
भीमाल पेन का जन्म प्राचीन काल में चैत्र पूर्णिमा के दिन हुआ था। वे मध्य प्रदेश की मैकल पर्वतमाला की तराई में स्थित 'लांजी' (रखिया हर लालजी) के निवासी भूरा भूमिका और कोतमा राय के पुत्र थे।
- माता-पिता की भेंट: भीमाल पेन के पिता भूरा भगत शिकार के शौकीन थे। एक बार जंगल में पानी की खोज के दौरान उनकी मुलाकात राजा ढोला उइके की पुत्री कोतमा से हुई। दोनों का विवाह हुआ और उनके घर भीमाल पेन का जन्म हुआ।
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भाई-बहन: भीमाल पेन कुल 11 भाई-बहन थे।
- 6 भाई: भीमा, जाटवा, केसबा, हिरवा, भाईजी और सांवरा।
- 5 बहनें: कंडरी, सोनगोर, अंगूरकोसा, खेरो और देही। (इनमें सबसे छोटी बहन खेरोदाही को आयुर्वेद की माता माना जाता है)।
2. गोटुल शिक्षा और गुरु
भीमाल पेन की शिक्षा गोंडी परंपरा के प्रसिद्ध संस्थान 'गोटुल' में हुई।
- वे 5 वर्ष की आयु में गोटुल गए और 18 वर्ष की आयु तक वहां रहकर सर्वगुण संपन्न बने।
- उनके गुरु गोटुल के अध्यक्ष मोरसे नाल (नेहरु भूमिका) थे।
- भीमाल पेन ने बहुत ही कम समय में धनुर्विद्या, योग विद्या और इंद्रजाल (सिद्धियाँ) जैसी कठिन विधाओं में निपुणता हासिल कर ली थी।
3. 'कुवार्याल' (ब्रह्मचारी) रहने का रहस्य
भीमाल पेन को 'कुवार्याल' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे आजीवन अविवाहित रहे। इसके पीछे एक रोचक कहानी है:
- राजा श्वेता की दो जुड़वां पुत्रियां, बमलाई और समलाई, भीमा से विवाह करना चाहती थीं।
- परंतु भीमा ने समाज सेवा को प्राथमिकता दी और एक शर्त रखी: "यदि मुर्गे के बांग देने से पहले कोई मुझे खोज लेगा, तो ही मैं विवाह करूँगा।"
- भीमा अपने गुरु के दर्शन कर समाज सेवा में निकल गए। दोनों बहनें उन्हें खोजते हुए निकलीं। बमलाई डोंगरगढ़ में थक कर रुक गईं (आज उन्हें बम्लेश्वरी कहा जाता है) और समलाई कुराड़ी तक पहुँचीं, जहाँ मुर्गे ने बांग दे दी। इस प्रकार शर्त के कारण वे अविवाहित रहे।
4. जल पेन और रक्षण पेन के रूप में पहचान
- जल पेन (Water Deity): भीमाल पेन को पानी का देवता माना जाता है क्योंकि वे अपनी योग शक्ति के बल पर मूसलाधार बारिश करवाने में सक्षम थे। आज भी अच्छी वर्षा के लिए उनका आह्वान किया जाता है।
- रक्षण पेन (Protector): उन्हें गोंडवाना का रक्षक माना जाता है। उन्होंने गांव-गांव जाकर व्यायामशालाएं (अखाड़े) स्थापित किए और कोयावंशीय युवाओं को कुश्ती और आत्मरक्षा की शिक्षा दी। वे व्यायामशाला के जन्मदाता माने जाते हैं।
5. सामाजिक दर्जा और मुख्य स्थान
- चौथा धर्मगुरु: अपनी विद्वत्ता और समाज के प्रति समर्पण के कारण उन्हें 'मुठवा' यानी समाज के मार्गदर्शक और चौथे धर्मगुरु का दर्जा प्राप्त है।
- मुख्य पेनठाना: उनका प्रमुख देवस्थान छिंदवाड़ा जिले में पेंच नदी के किनारे 'सुनील मेटा' में स्थित है।
6. एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण
गोंडी गाथाओं के अनुसार, भीमाल पेन का संबंध हिंदू पौराणिक कथाओं से नहीं है। भीमाल पेन का इतिहास स्वतंत्र है और वे हनुमान जी से भिन्न हैं। यद्यपि कुछ स्थानों पर उनके थानों को हनुमान मंदिर में बदलने की कोशिश की गई है, लेकिन कोइतूर समाज उन्हें अपने महान पूर्वज और शक्तिपुंज के रूप में ही पूजता है।
निष्कर्ष:
कुवार्याल भीमाल पेन का जीवन हमें अनुशासन, शक्ति और समाज सेवा की प्रेरणा देता है। वे जल के रूप में जीवन और रक्षण पेन के रूप में सुरक्षा प्रदान करने वाले गोंडवाना के अमर नायक हैं।
जय सेवा! जय गोंडवाना!


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